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शिकागो: ऐसे कई अध्ययन सामने आये हैं जिनसे मालूम हुआ है कि काली चाय कई तरह के कैंसर में सुरक्षा कवच उपलब्ध कराती है। अब वैज्ञानिकों को मालूम हो गया है कि क्यों यह सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। काली चाय में मौजूद कैंसर से लड़ने वाला तत्व थियाफ्लाविन-3 मोनोगैलेट (टीएफ 2) है। यह कैंसररोधी तत्वों के परिवार का एक सदस्य है, जिसे पोलीफेनोल कहा जाता है। न्यू ब्रंसविक, न्यू जर्सी के रटजर्स युनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. कुआंग यू चेन ने कहा कि टीएफ-2 में कई रोचक गुण मौजूद हैं। अमेरिकन केमिकल सोसाइटी की वार्षिक बैठक में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए डॉ. चेन ने बताया कि जब टीएफ-2 का असर शुरू होता है तो कैंसर कोशिकाओं को एक तरह से आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है, जबकि सामान्य कोशिकाओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कैंसर की कोशिकाओं को मारने में सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि आसपास की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त न हों। डॉ. चेन ने कहा कि जब प्रयोगशाला में कैंसर से क्षतिग्रस्त कोलोन कोशिकाओं और स्वस्थ कोशिकाओं को काली चाय के टीएफ-2 से मिलाया गया तो कैंसरग्रस्त कोशिकाओं में एपॉपटोसिस की प्रक्रिया शुरू हो गयी। एपापटोसिस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें नियत अंतराल के बाद कोशिकाएं एक-एक कर मरती चली जाती है। इस प्रयोग में यह देखा गया कि स्वस्थ कोशिकाएं और स्वस्थ हुईं उन्हें किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा। डॉ. चेन की टीम ने और आगे भी जांच की। उनका निष्कर्ष है कि टीएफ-2, ऐसा लगता है कि कॉक्स-2 जीन की गतिविधि को ही दबा देता है। कॉक्स-2 जीन कैंसर संबंधी जांच के केन्द्र में वर्षों से रहा है और जब यह जीन सक्रिय होने लगता है तो पहले सूजने की प्रक्रिया शुरू होती है और अंततः कई चरणों के बाद यह सामान्य कोशिका को कैंसरग्रस्त कोशिका में बदल देता है। कॉक्स-2 और कोलोन कैंसर का अंतर संबंध बहुत पहले से वैज्ञानिकों को मालूम है। कोलोन कैंसर के इलाज के लिए जो भी दवाएं प्रभावशाली ढंग से काम करती हैं उनमें आर्थराइटिस में व्यवहार में लायी जानेवाली दवा वियोक्स और सेलीब्रिक्स ही प्रमुख है। यह कॉक्स-2 जीन को बढाने में काम आती है। डॉ. चेन ने कहा कि इस नयी खोज से दवा बनानेवाली कंपनियां कॉक्स-2 को दबाने के लिए काली चाय की ओर उन्मुख होंगी और कम खर्च में इलाज संभव हो सकेगा। हालांकि बहुत से सवालों के उत्तर अब भी मिलने हैं। मसलन कितनी मात्रा वाली चाय पीने से कैंसर को दबाया जा सकेगा और पीने की कम से कम मात्रा क्या होगी। डॉ. चेन ने कहा कि यह अनुसंधान अभी अपने पहले ही चरण में है। एक आश्चर्य यह भी है कि पॉलीफेनोल अन्य खाद्य पदार्थों और पेय में भी पाये जाते हैं पर ये पॉलीफेनोल उतना नाटकीय प्रभाव नहीं डालते जितनी काली चाय का पॉलीफेनोल डालता है। हरी चाय और अंगूर में भी यह मिलता है, पर ये भी उतने असरकारी नहीं मिले। डॉ. चेन ने कहा बहरहाल यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है। मुख्य बात यह है कि हमें लक्ष्य अब स्पष्ट दिख रहा है और कोलोन कैंसर का बेहतर इलाज अब हम काली चाय से कर पायेंगे।
