मोटापा जैसी समस्या को हम कम कर आंक रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री भी देश में मोटापे को लेकर चिंता जता चुके हैं। मोटापा एक ऐसी महामारी के रूप में सामने आ गया है जिसके लिए हमने कोई रक्षात्मक कदम नहीं उठाया। हाल में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने जो अनुसंधान किया है उससे आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये हैं। मसलन यह केवल सम्पन्न और विकसित देशों तक ही सीमित नहीं है, इसने विकासशील देशों को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। अब तक का अनुमान था कि विकासशील देशों में लोग कुपोषण के शिकार ज्यादा होते हैं। कुपोषण तो ज्यादा है ही पर महानगरीय क्षेत्रों में अति पोषण बड़े पैमाने पर मोटापे में अभिव्यक्त हो रहा है। अमेरिका में 60 प्रतिशत लोग मोटापे से ग्रसित हैं। मोटापा से जुड़े मधुमेह, कैंसर और हृदय रोग जैसे अभिशाप तो अलग हैं जो इसे एक भयानक बिमारी बना देते हैं। खर्च के साथ-साथ ये बीमारियां पूरे परिवार को तोड़ कर रख देता है। इससे उबरने में परिवार को वर्षोँ लग जाता है।
बोस्टन में हाल में हुई अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एडवांसमेंट ऑफ साइंस (एएएएस) की बैठक में मानविकी विशेषज्ञ मारकिस ला वेले ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि पूरी मानव प्रजाति ही मोटी होती जा रही है और प्रजाति के स्वास्थ्य के लिहाज से यह मोटापा जानलेवा साबित हो सकता है। उन्होंने अपने निष्कर्ष में कुछ चैंकानेवाली बात बतायी। जैसे कि लोग अब पहले से ज्यादा लंबे हो रहे हैं- उनके पैरों के आकार बढ़ रहे हैं। अमेरिका में एक स्टेडियम को लोगों को समंजित करने के लिए फिर से ठीक-ठाक करना पड़ा। डा. ला वेले ने अपने एक सहकर्मी के शोध के हवाले से बताया कि पैर का आकार बढ़ने के कारण- जूते बड़े बनाने पड़ेंगे और आगे आने वाले समय में इतने चमड़े की जरूरत होगी जो यहां से चांद तक और चांद से यहां खींचा जा सके।
इस मोटापा का कारण आनुवांशिक भी नहीं है। यह परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ कि लोगों ने इस पर गहराई से ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी। इसे व्यक्तिगत समस्या के रूप में देखा गया जबकि इसे पूरी प्रजाति की समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए था। लोग वसायुक्त पदार्थों का ज्यादा सेवन करने लगे- साथ ही उनकी जीवनशैली ज्यादा स्थिर होती गयी। अब तक के आंकड़ों का विश्लेषण यह बताता है कि इस महामारी का आय से लेना-देना कम पर्यावरण, हमारे रहन-सहन और खान-पान की शैली से ज्यादा है।
डीयरबोर्न यूनिवर्सिटी, मिशिगन के प्रोफेसर बैरी बोगिन ने ग्वाटेमाला में रह रहे माया जाति के बच्चों और इसी जाति के अमेरिकी शहरों में रहने वाले बच्चों की तुलना की। शहरों में रहने वाले बच्चे ग्रामीण बच्चों के मुकाबले ज्यादा लंबे और भारी भरकम पाये गये। इसमें आधे से अधिक का वजन ज्यादा मिला। 42 प्रतिशत लड़के मोटापे से ग्रस्त हैं। बचपन का मोटापा उनकी आगे आने वाली जिंदगी में उनके लिए स्वास्थ्य की कई समस्याएं पैदा करेगा।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. स्टैनली अलजैस जैक ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि पैसिफिक और पापुआ न्यू गिनी की एक समय की सक्रिय और भूख से पीडि़त संस्कृति ने भी अब मोटापा ओढ़ लिया है। समोआ के 77 प्रतिशत वयस्क मोटापे से पीडि़त हैं। नसाऊ की 65 प्रतिशत आबादी बुरी तरह मोटापे से ग्रसित है।
प्रो. स्टैनली ने कहा कि इस तरह के मोटापे का वंशानुगत लेना-देना कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि लोगों ने अपना व्यवहार और खान-पान ऐसा बना लिया है कि मोटापा हमारी नियति बनती जा रही है। हमारे खान-पान का एक तरह से मैक्डोनाल्डीकरण हो गया है और मानव प्रजाति मोटी होने के लिए जैसे अभिशप्त है। अब समय आ गया है कि मोटापे की इस समस्या से छुटकारे के लिए व्यापक अभियान चलाया जाये। मानव प्रजाति ने विकास की अंध दौर में वह सब कुछ भुला दिया जो प्राकृतिक था। प्रकृति अपने नियमों के उल्लंघन के लिए मानव प्रजाति को दंडित न करे इसका इंतजाम मानव प्रजाति को ही करना है।
बहुत अच्छा VB 🙏 आपने एक विचारोत्तेजक और समृद्ध लेख साझा किया है। मैं इसे अकादमिक रूप में अद्यतन करते हुए वैज्ञानिक शोध और हाल की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के संदर्भ जोड़कर प्रस्तुत कर रहा हूँ।
मोटापा: वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक उभरती चुनौती
परिचय
मोटापा (Obesity) आज केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक महामारी (Global Epidemic) का रूप ले चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मोटापे को 21वीं सदी की सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना है (WHO, 2024)। भारत के प्रधानमंत्री तक ने इस पर चिंता व्यक्त की है, क्योंकि यह समस्या अब केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं रही, बल्कि विकासशील देशों, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में भी, तेजी से फैल रही है।
मोटापे का वैश्विक परिप्रेक्ष्य
संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्तमान में लगभग 42% वयस्क और 20% किशोर मोटापे से ग्रसित हैं (CDC, 2023)। इसी प्रकार, प्रशांत द्वीप देशों जैसे समोआ और नाउरू में मोटापे की दर क्रमशः 77% और 65% तक पहुँच चुकी है (Alleyne et al., 2022)। भारत जैसे देशों में भी, जहां एक समय कुपोषण प्रमुख समस्या थी, अब शहरीकरण, बदली हुई जीवनशैली और उच्च वसा वाले भोजन की उपलब्धता के कारण मोटापा तेजी से बढ़ रहा है (ICMR-NIN, 2022)।
कारण
शोध यह स्पष्ट करते हैं कि मोटापा केवल आनुवंशिक कारणों से नहीं है, बल्कि इसका मूल कारण हमारे भोजन और जीवनशैली में हुए बदलाव हैं।
- खानपान का मैक्डोनाल्डीकरण (McDonaldization of diet): उच्च वसा, चीनी और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन।
- शारीरिक निष्क्रियता (Sedentary Lifestyle): शहरीकरण के चलते शारीरिक श्रम की कमी।
- पर्यावरणीय और सामाजिक कारक: आर्थिक स्थिति से अधिक भोजन की उपलब्धता और सांस्कृतिक बदलावों का प्रभाव (Swinburn et al., 2019)।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
मोटापे को कई दीर्घकालिक बीमारियों का मुख्य कारक माना जाता है, जिनमें शामिल हैं:
- टाइप-2 मधुमेह
- हृदय रोग
- कैंसर के कुछ प्रकार
- मनोवैज्ञानिक समस्याएँ (जैसे अवसाद और सामाजिक भेदभाव)
WHO का अनुमान है कि मोटापे के कारण प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख समयपूर्व मौतें होती हैं (WHO, 2024)।
विशेष अध्ययन
- मिशिगन की डीयरबॉर्न यूनिवर्सिटी के प्रो. बैरी बोगिन ने ग्वाटेमाला के माया बच्चों और अमेरिका में बसे माया बच्चों की तुलना करते हुए पाया कि शहरी बच्चों में अधिक लंबाई के साथ मोटापा भी बढ़ा (Bogin, 2021)।
- ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्टैनली उल्जास जैक के अध्ययन ने प्रशांत देशों में तेजी से बढ़ते मोटापे को जीवनशैली और खाद्य व्यवहार में बदलाव से जोड़ा (Ulijaszek, 2018)।
निष्कर्ष और समाधान
स्पष्ट है कि मोटापा केवल व्यक्तिगत स्तर की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानव प्रजाति के स्वास्थ्य के लिए खतरा है। इससे निपटने के लिए आवश्यक है:
- नीति-स्तर पर हस्तक्षेप – स्वस्थ खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और जंक-फूड पर नियंत्रण।
- स्वास्थ्य शिक्षा – विशेषकर बच्चों और किशोरों में सही पोषण और व्यायाम की आदत डालना।
- व्यक्तिगत प्रयास – नियमित शारीरिक गतिविधि और संतुलित भोजन अपनाना।
यदि समय रहते व्यापक अभियान नहीं चलाए गए, तो मोटापा वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली और सामाजिक ढांचे के लिए गंभीर संकट बन जाएगा।
संदर्भ सूची (References)
- WHO. (2024). Obesity and overweight. World Health Organization.
- CDC. (2023). Adult Obesity Facts. Centers for Disease Control and Prevention.
- Alleyne, G., et al. (2022). The global obesity pandemic: shaping policy and health systems. The Lancet.
- Swinburn, B. A., et al. (2019). The global syndemic of obesity, undernutrition, and climate change. The Lancet, 393(10173), 791–846.
- Bogin, B. (2021). Anthropological perspectives on obesity and growth. American Journal of Human Biology.
- Ulijaszek, S. J. (2018). Obesity: A disorder of growth. Cambridge University Press.
- ICMR-NIN. (2022). Dietary Guidelines for Indians. Indian Council of Medical Research – National Institute of Nutrition.
