– विजय भास्कर
अंतरिक्ष, मानव के लिए हमेशा से रहस्य, रोमांच और आकर्षण का केंद्र रहा है। मानव के चांद पर उतरने के बाद से खगोल-भौतिकी क्षेत्र में मानव की उपलब्धियों ने इसे और आकर्षक और रहस्यपूर्ण बना दिया है। अश्वेत विवर, वामन तारे जैसे आकाशीय पिंडों के बारे में हमारी जानकारी बढ़ी है। दरअसल मानव अब तक सही-सही कह सकने की स्थिति में नहीं है कि उसका रिहायशी ग्रह कब और कैसे बना? महागर्जन या बिग बैंग सिद्धांत लगभग सही व्याख्या करता है- पर संतुष्टि की सीमा तक नहीं। पिछले एक दशक में नासा ने जो जानकारियां एकत्र की हैं उससे बाह्य अंतरिक्ष और सुदूर अंतरिक्ष के कई पहलू सामने आये हैं। खासकर दस साल से अंतरिक्ष में घूमते हब्बल टेलिस्कोप ने विभिन्न आकशयीय पिंडों और कुछ दुर्लभ क्षणों के चित्र लिये हैं। ये अंतरिक्ष का एक परम आकर्षक पक्ष पेश करते हैं। हब्बल को अंतरिक्ष शटल डिस्कवरी से 1990 में अंतरिक्ष में प्रेषित किया गया था। यह रोज, लगातार इतने आंकड़े भेजता है कि जिससे 10,000 मानक कंप्यूटर के डिस्क भर जायें। बुध और सूर्य को छोड़कर इसने अन्य सभी ग्रहों की कई ढंग से पड़ताल की है। जितने ब्रह्मांड का सर्वेक्षण किया जा सकता है वह 100 अरब आकाशगंगाओं तक फैला है और यह पूरा सुदूर अंतरक्षि हब्बल के अवलोकन के लिए उपलब्ध होगा। पूरा सर्वेक्षण करने में हब्बल को 900,000 साल लग जायेंगे।
अब हब्बल और चंद्र जैसे उच्च क्षमतावाले टेलिस्कोप से हमें रंगीन तस्वीरें मिल रही हैं- उनका सौंदर्य अभिभूत कर देनेवाला है। रहस्मय अंतरिक्ष के नजरिये से भी और मानव की उपलब्धियों के ख्याल से भी। हब्बल से पृथ्वी को प्रेषित किये गये कई ऐसे चित्र नासा ने जारी किये हैं। हब्बल या चंद्र जैसे शक्तिशाली टेलिस्कोपों के बारे में एक तकनीकी गलतफहमी हमें दूर कर लेनी चाहिए, मसलन ये केवल टेलिस्कोप भर नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष यान है। इस नजरिये से अगर हब्बल को देखें तो इसका व्यास 4.2 मीटर और इसकी लंबाई 13.2 मीटर है। एक बड़े स्कूल बस के बराबर। वजन 1,134 किलोग्राम। माक्सोतुव रिफलेक्टर टेलिस्कोप इमसें लगा है जिसका प्राथमिक दर्पण 2.4 मीटर के व्यास का और मध्य दर्पण 30.5 सेंटीमीटर व्यासवाला है। प्राथमिक दर्पण के जरिये तीन कैमरों से अंतरिक्ष देखा जाता है। इसमें एक वाइड फील्ड प्लेनेटरी कैमरा है जो सुदूर अंतरिक्ष तक देखने की क्षमता रखता है-दूसरा स्पेस टेलिस्कोप इमेजिंग स्पक्ट्रोग्राफ है और ब्रह्मांड के देखे जानेवाले हिस्सों को रंगों में बांटता है। तीसरा है फेंट आब्जेक्ट कैमरा – जो सुदूर अंतरिक्ष पिंडों का चित्र लेने में सक्षम है। यह एक प्रकार का टेलिस्कोप है। यह पूरे कैमरे को किसी क्षण में किसी एक पिंड या स्थान पर लॉकिंग पद्धति से केंद्रित कर देता है।
इसके प्रकाश पथ में 48 विभिन्न प्रकार के फिल्टर होते हैं। यह कैमरा चित्र लेने के लिए फिल्म का इस्तेमाल नहीं करता। इसके संवेदकों पर लगे 640,000 से ज्यादा पिक्सेल भूमि स्थित नियंत्रण केंद्र पर सूचनाएं भेजते हैं जिन्हें कंप्यूटर छायाकृति में अनूदित करता जाता है।
हब्बल टेलिस्कोप को ऊर्जा सूर्य से इसमें लगे 12.2 मीटरवाले सौर पैनलों के जरिये मिलती है। ये सौर ऊर्जा पैनल लगभग 2400 वाट ऊर्जा उत्पन्न कर लेते हैं। औसतन हब्बल का उतनी ही ऊर्जा से काम हो जाता है जितनी चौबीस घरों में जलाये जानेवाले बल्बों में लगती है। ऊर्जा संग्रह के लिए इसमें छह निकल-धातु-बैटरी लगी हुई है जिसकी 20 कारों की बैटरियों के बराबर ऊर्जा संरक्षित करने की क्षमता है।
हब्बल टेलिस्कोप की अनुमानित जीवन अवधि 20 साल है, जिसमें से 10 साल वह अंतरक्षित में बिता चुका है। नासा अगली पीढ़ी का टेलिस्कोप प्रक्षेपित करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए ऐसे स्थान का चयन भी बारीकी से किया जाना है और व्यवस्था यह भी की जा रही है कि टेलिस्कोप अवरक्त किरणों से दमके नहीं जैसा हब्बल दमकता था- शायद चंद्रमा की कक्षा से बाहर स्थापित करने पर ऐसा संभव हो पाये। अगली पीढ़ी का टेलिस्कोप महागर्जन या बिग बैंग के पांच लाख वर्ष बाद के समय का चित्र लेने में सक्षम होगा जब पहली पीढ़ी के तारे बनने शुरू हुए थे और जीवन तत्वों का आगमन हुआ।
हालांकि पृथ्वी पर दूरी की गणनाएं हम किलोमीटर में कर लेते हैं, पर अंतरिक्ष इतना विशाल है कि उसकी दूरी की गणना के लिए हम प्रकाश वर्ष का प्रयोग करते हैं। यानी एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है- प्रकाश का वेग 299,300 किलोमीटर प्रति सेकेंड है। सूर्य से पृथ्वी तक प्रकाश को पहुंचने में लगभग आठ मिनट का समय लगता है। हब्बल से मिली अंतरिक्ष जानकारी इस बात के संकेत देती हैं कि हमारा ब्रह्मांड 12-16 अरब वर्ष पुराना है। वैसे पिंड जो हमसे 20 अरब प्रकाश वर्ष दूर है उनका प्रकाश तो अब तक पृथ्वी तक पहुंचा भी नहीं होगा। बहरहाल, हब्बल से ली गयी तस्वीरों के वैज्ञानिक पक्ष से अलग तस्वीरों का एक मनोहारी पक्ष भी है जिसने पॉपुलर फोटोग्राफी के प्रकाशन निदेशक हरवर्ट केपलर जैसे पारखी को सौंदर्य की दृष्टि से प्रभावित किया उनके चुने और हब्बल के लिये गये चित्र।
प्राकृतिक रंगों वाला शनि: अपने स्वाभाविक रूप में शनि ऐसा ही दिखता है।
सूक्ष्म पीले, भूरे रंगों से बने बैंड शनि के बादलों में परिवर्तन दर्शाते हैं। बहुत ऊंचाईवाले बादलों में ज्यादातर रंगहीन अमोनिया और अमोनिया हिम से बना है। शनि का छल्ला कई छोटे-छोटे छल्लों से बना है और इसमें ज्यादातर बर्फ होता है। यह चित्र वायजर-2 ने 21 जुलाई 1981 को तब लिया था जब शनि इस ग्रह से तीन करोड़ 30 लाख किलोमीटर दूर था।
शनि की अवरक्त किरणवाली तस्वीर: ये शनि के स्वाभाविक रंग नहीं हैं। हब्बल के अवरक्त कैमरे और स्पेक्ट्रोमीटर से प्राप्त इस चित्र में शनि के बादलों और धुंधलके के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती है। नीला रंग साफ वातावरण दर्शाता है। नीले रंग की विभिन्नताएं कणों के आकार और रासायनिक संरचना में विभिन्नता दर्शाती है। हरा रंग बादलों की मुख्य सतह ऊपर के धुंधलके को दिखाता है। जहां पीला रंग है वहां ज्यादा घने बादल हैं। नारंगी रंग वातावरण में ऊंचे और लाल रंग ऊंचाई पर स्थित बादलों को दर्शाता है।
तपता तारा:सूर्य के अलावा किसी दूसरे तारे की प्रत्यक्ष ली गयी यह पहली छवि है। इसका नाम अल्फा ओरियोनिस है। इस चित्र को 3 मार्च 1995 को लिया गया था। अवसान की ओर जाता यह एक जलता हुआ लाल तारा है जो ओरायन नक्षत्रमंडल में है। इस तस्वीर से बहुत घने पराबैंगनी वातावरण का संकेत मिलने के साथ एक धब्बा भी मिलता है। तारे की सतह पर यह बेहद तापीय धब्बा है। धब्बा इतना बड़ा है कि यदि हमारे सौरमंडल में इसे सूर्य के स्थान पर रख दिया जाये तो इसके बाहरी वातावरण का विस्तार वृहस्पति से आगे तक चला जायेगा। तारों का जब तक अंत नहीं हो जाता वे इसी तरह चमकते हैं। मार्च 1997 में ली गयी इस तस्वीर से लगता है अंतरिक्ष में आतिशबाजी हो रही हो। यह विस्फोट निहारिका एनजीसी 6751 का है जिसमें हजारों साल पहले एक लाख 60 हजार के वेग से गैस निकला होगा। ये गैसें एक तपते हुए तारे से निकलीं जो केंद्र में दिख रहा है। इस तारे का नाम वोल्फ रायेन (डब्ल्यूएफ 124) है। खगोल विज्ञानियों का कहना है कि लगभग ऐसी ही स्थिति सूर्य की होगी- लेकिन छह अरब साल बाद। 15,000 प्रकाश वर्ष दूर यह तारा एक तरह के भीषण उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है- बाहर निकलनेवाली मात्रा से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यह अभी काफी नया है 10,000 वर्ष ज्यादा उम्र इसकी नहीं होगी।
नजदीक के तपते हुए दो तारों से हुआ विकिरण : नेबुला के बीचोबीच अंतरिक्षमंडल के बादलों को नष्ट करते हुए चमकते तारे मेरोय के प्रकाश के कारण प्रकाशमान दिख रहे हैं। सतह पर अत्यधिक गर्मी और एकदम शीतलता के कारण घूमे हुए बादल तूफान का आभास देते लग रहे हैं।
8000 प्रकाश वर्ष दूर: माइकन-18 8000 प्रकाश वर्ष दूरी पर स्थित एक गोलाकार नेबुला। इसमें ढेर सारे तारे हैं और यह सूर्य से 100 गुना ज्यादा गर्म है। 19वीं सदी के खगोलविद् सर जान हर्सचील ने इसका नाम बीच के छिद्र के कारण की होल नेबुला रखा था। इस छिद्र में फ्लोरिसेंट गैस के चमकते फिलामेंट और ठंडे अणुओं की छाया और धूल हैं।
