1975 की इमरजेंसी के वे पत्रकार बखूबी याद कर सकते हैं जिन्होंने उस समय पत्रकारिता में प्रवेश किया था या जो मंजे हुए पत्रकार हो गये थे। शासक हमेशा से यही नज़रिया रखता है कि प्रेस को उसकी खिलाफत करने का अधिकार नहीं है, लेकिन इसकी जड़ें कहीं न कहीं ईस्ट इंडिया कंपनी के कोलकाता मुख्यालय और वहां के सरकारी अधिकारियों का बार-बार प्रेस का गला घोंटने की कोशिशों में ढूंढ़ी जा सकती हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सबसे पहले जेम्स अगस्टस हिक्की को कलकत्ता गजट निकालने की अनुमति दी। इस अखबार के प्रकाशक, संपादक और प्रिंटर सब कुछ हिक्की ही थे। हिक्की ने पहले अंक से ही ब्रिटिश शासन का विरोध जो शुरू किया तो वह रुके नहीं। ईस्ट इंडिया कंपनी को यह बात बेहद नागवार गुजरी कि भारतीयों का विरोध तो दूर वह तो अपनों के अपनी ही भाषा में विरोध से हलकान होने लगी। सरकार ने तब कई तरह से उपाय किये – मसलन 13 मई 1999 को लॉर्ड वेलेस्ली ने कोलकाता से प्रकाशित होनेवाले समाचारपत्रों के लिए एक निर्देश जारी किया। पहला- हर प्रिंटर अखबार के अंत में अपना नाम छापा करेगा, दूसरा- हर अखबार के मालिक और संपादक का नाम और आवासीय पता सरकार के सचिव के पास दर्ज कराना होगा, तीसरा- रविवार को कोई पत्र प्रकाशित नहीं होगा। चौथा– कोई भी पत्र तब तक प्रकाशित नहीं होगा जब तक सरकार के सचिव या उनके प्रतिनिधि पूरी तरह अनुमति न प्रदान करें। इस नियम में किसी भी तरह के उल्लंघन की सजा निर्वासन थी।

यह तब की बात थी जब अधिकतर अखबार और उनकी संपादकीय जिम्मेदारी ब्रिटिश या अन्य विदेशी नागरिकों पर थी। इससे पहले आयरिश मूल के एक अमेरिकी विलियम डुयेन को कंपनी ने कुछ गलत रिपोर्टिंग का दोषी पाकर इंग्लैंड वापस भेजने का फरमान सुना दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फरमान को बहाल रखा। विलियम डुयेन ने यहां रहते हुए 3000 रुपये की संपत्ति अर्जित की थी पर उसे एक फूटी पाई की भरपाई नहीं की गयी। बाद में डुयेन अमेरिका चला गया और वहीं से ब्रिटिश विरोधी अखबार अरोड़ा निकालना शुरू किया। 1791 और 1798 के बीच कई संपादकों पर गाज गिरी। कुछ ने माफी मांगी और दुबारा ब्रिटिश विरोधी समाचार न छापने का फैसला किया। चूंकि इन प्रतिबंधों का मुखर विरोध ज्यादा हुआ नहीं इसलिए सरकार ने इसकी निरंतरता बनाये रखने में ही ज्यादा रुचि ली। इसके साथ ही सरकार ने सचिव के लिए जो निर्देश जारी किये उसमें उन्हें यह देखना था कि सरकार के राजस्व और देनदारियों, सैनिक पोत की आवाजाही, सरकार, सेना, असैनिक, मरीन, व्यावसायिक और न्यायिक सेवा के किसी अधिकारी के व्यवहार से जु़डी सामग्री, यूरोपीय समाचार पत्रों के वैसे अंशों के पुनर्प्रकाशन जिससे ब्रिटिश सरकार की छवि खराब हो, न छपे। इसके बाद जैसे प्रेस को दबाने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह रुका नहीं। जो भी नया गवर्नर जनरल आता वह ब्रिटिश शासन को ‘इनसुलेट’ कर राज्य की वाहवाही लूटना चाहता था। लॉर्ड मिंटो के उत्तराधिकारी लॉर्ड मोइरा और उसके बाद लॉर्ड हेस्टिंग ने 16 अक्तूबर 1813 को सभी प्रतिबंधों से आगे जाकर कुछ नये प्रतिबंध लगाये। मसलन सभी अखबारों के प्रूफशीट, पूरक प्रकाशन सहित, मुख्य सचिव से क्लियर कराने के लिए भेजे जाएं। प्रेस से छपने वाले सभी हैंडबिल, नोटिस और दूसरी सामग्रियां भी मुख्य सचिव को पहले प्रेषित की जाएं। छपने वाले मुख्य आलेखों के शीर्षक मुख्य सचिव को भेजे जाएं। यदि मुख्य सचिव को किसी शीर्षक पर शक-ओ-शुब्हा होगा तो उसे वे मंगाकर देखने के बाद प्रकाशन की अनुमति दे सकते हैं। इसके अलावा पहले से बने नियम पूरी तरह अस्तित्व में बने रहेंगे। इसमें अगले आदेशों में जरूरी हो तो सुधार किया जा सकता है।
लॉर्ड वेलेस्ली ने 1801 में एक परिकल्पना सामने रखी थी सरकारी अखबार निकालने की। वेलेस्ली को लगता था कि प्रेस को एक प्रिंटिंग प्रेस लगाकर ही चुप किया जा सकता है। उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि छपने वाले अखबार साहित्य की दृष्टि से जनहित के लिए बेकार हैं। लेकिन सट्टेबाजों (?) के लिए अद्भुत लाभ का ज़रिया बन गये हैं। ऐसे में इन्हें किसी तरह का सरकारी लाभ (विज्ञापन, प्रिंटिंग या अनुदान) बिल्कुल नहीं दिया जाना चाहिए।
केवल सरकार का पक्ष छपने के कारण हम समझ सकते हैं कि अखबार की दशा-दिशा क्या हो गयी होगी और पाठकों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाये रखने के लिए उन्हें कितनी मुसीबत झेलनी पड़ी होगी।
इस जबरिया सेंसरशिप के पहले शिकार जेम्स अगस्टस हिक्की ही हुए। हां, एक प्रतिबंध उन्होंने और लगाया था और वह था किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप या स्कैंडल से वे परहेज करें।जेम्स अगस्टस हिक्की सरकारी कर्मियों पर कटाक्ष करने में बेहद दक्ष संपादक माने जाते थे। जनता में वे जितने लोकप्रिय थे सरकार के बीच उतने ही अलोकप्रिय। अपने व्यंग्य पर वे इतना झीना आवरण रखते थे कि किसी को देखने में यह दिक्कत नहीं होती थी कि उनका आशय किसकी ओर है।
हिक्की की पत्रकारिता को सरकार विरोधी मानते हुए उन्हें जेल में भी डाल दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ कि वारेन हेस्टिंग्स ने हिक्की पर उस समय ₹ 80,000 (अस्सी हजार रुपये) का जुर्माना लगा दिया। जुर्माना नहीं अदा करने पर हिक्की को जेल जाना पडा़। हिक्की ऐसे पहले शख्स बने जिन पर किये जुल्मों को ब्रिटिश अधिकारी दूसरों के लिए नज़ीर बना देना चाहते थे। पहले उनकी सजा घटा कर ₹ 5000 और एक साल कैद में बदली गयी। दूसरी बार जब हेस्टिंग ने हिक्की पर मुकदमा किया और उसकी क्षतिपूर्ति के रूप में कोर्ट ने ₹ 5,000 अदा करने का हुक्म हिक्की को दिया। बाद में इसे माफ कर दिया गया।
हिक्की के प्रेस में सरकारी सामग्री भी काफी छपती थी और उनका सरकार पर बकाया बढ़कर ₹ 43514-1-3 (तैंतालीस हजार पांच सौ चौदह रुपये एक आना तीन पैसे) हो गया था। हिक्की ने अपनी और अपने परिवार की माली हालत का हवाला देते हुए अधिकारियों से लेकर गवर्नर जनरल तक से कातर आरजू-मिन्नतें की। गवर्नर जनरल जान शोरे केपास जब पूरे भुगतान के लिए हिक्की का आवेदन पहुंचा तब बड़ी निर्ममता से उसने काटकर राशि ₹ 6711 कर दी। ऐसा उसने क्यों किया इसका कारण बताना भी जरूरी नहीं समझा। धीरे धीरे हिक्की की हालत यह हो गयी थी कि तैंतालीस हजार के छह हजार में परिवर्तन को ही उन्हें स्वीकार करना पड़ा। प्रेस तो बंद करना ही पड़ा अंत में हिक्की को उसी वारेन हेस्टिंग की शरण में जाना पड़ा जिसके प्रति कई बार वे अखबार में कड़ा रवैया अपना चुके थे। हेस्टिंग से वे केवल इतना ही कहने गये थे कि उन्हें कोलकाता मार्केट में डिप्टी क्लर्क का पद दे दिया जाये जिससे कम से कम अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। हिक्की साहसी बहुत थे पर अपने साहस का मूल्य उन्हें चुकाना पड़ा। भले ही वे बाद में मुफलिसी में गुम हो गये हों पर भारतीय पत्रकारिता के इतिहास केलिए वे एक अविस्मरणीय व्यक्ति बन गये। इमरजेंसी में सरकार ने इस पूरे प्रकरण का उपयोग यूजर मैनुअल की तरह किया।
जैसा कि पत्रकारिता में दस्तूर है हिक्की गजट की डगमगाती हालत देखते हुए एक इंडिया गजट ख़डा हो गया जिसके मालिक संपादक ‘मोस्ट आबिडिएंट एंड हंबल सर्वेन्ट, बी मेसिंक और पीटर रीड ने सरकार को अर्जी देते हुए भरोसा दिलाया वे पूरी तरह सरकार का पक्ष रखेंगे और किसी ऐसे काम में अपने को नहीं लगायेंगे जिससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचे। बड़ी कृपा होती अगर हमारे कोलकाता से बाहर के ग्राहकों के लिए फ्री पोस्टेज की अनुमति दी जाए वगैरह-वगैरह। फिर उन्होंने लिखा कृपया हमें सरकार का प्रिंटर भी नियुक्त कर दिया जाये तो हमें अपने कार्य निष्पादन में आसानी होगी। यह बिल्कुल सरकार के लिए – ‘जो रोगी को भाये वही वैद फरमाये’ जैसी स्थिति थी। सरकार को लगा कि हिक्की गजट से जो एक विषाक्त वातावरण बन गया है उसे सहज और ‘अनुकूल’ बनाने में इस पत्र से मदद मिलेगी। और इस सरकारी सदाशयता (?) को लपकने के लिए कई और मुखापेक्षी सामने आ गये। कलकत्ता गजट, बंगाल जनरल और ओरिएंटल मैगजीन, कलकत्ता क्रॉनिकल (1784-86) दो साल के अंदर बाजार में आ गये।
हिक्की प्रकरण भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का ऐसा स्याह पन्ना है जो दमन की दास्तां अपने में ज़ज्ब किये हुए है। पर इसकेसाथ ही सरकार और प्रेस के मूल चरित्र का भी विरल पहलू यह उजागर करता है।
1976 में इमरजेंसी के टिप्स संभव है इतिहास के इन्हीं पन्नों से मिले होंगे और कांग्रेस सरकार ने इसका इस्तेमाल यूजर मैन्युअल की तरह किया। सरकार ने जरा भी ध्यान नहीं दिया कि 1976 में शासक भारतीय थे और शासित भी। पर दमनकारी को, दमन के टिप्स जहां से मिलें उसे लगता है कि उसे सुशासन की कुंजी मिल गयी है।
भारत में इमरजेंसी के दमन में भी आपको सरकार-पत्रकार-अखबार का वही चाल, चेहरा, चरित्र नज़र आएगा जो आपने ऊपर पढ़ा है। कई बार हम भीषण से भीषण गलतियां करने से नहीं चूकते और दोहराव का आरोप इतिहास पर मढ़ देते हैं।
हमारी पीढ़ी के लोग जून को याद करते हैं इमरजेंसी के लिए- उस इमरजेंसी के लिए जिसमें लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी छिन गयी थी। एक आजाद नागरिक के सारे अधिकारों का अपहरण कर लिया गया था – केंद्र में सांविधानिक रूप से सरकार को बने रहने का कोई अधिकार नहीं था पर सरकार न केवल बनी हुई थी बल्कि बने रहने का कारण जनता को यह बता रही थी कि अभी आप इस लायक नहीं हुए कि लोकतांत्रिक आजादी को हैंडल कर सकें। आप को ऐसे लोग आज भी मिल जायेंगे जो आज के हालात पर तफसरा नस्र करते हुए कहेंगे कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों का शासन था। या इमरजेंसी जब लगी थी तो पूरा देश एकदम से अनुशासित हो गया था। संजय गांधी एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे जिन्होंने आबादी को नियंत्रित करने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाये और वह रहते तो आज भारत की तस्वीर दूसरी होती।
25 जून, 1975 को देश पर इमरजेंसी थोप दी गयी थी। जनता की आजादी के सारे अधिकार निलंबित हो गये। प्रेस पर सेंसरशिप लागू हो गया। तब एक ओर महंगाई आसमान छू रही थी दूसरी ओर गरीबी हटाओ का नारा बुलंद किया जा रहा था। जैसे यह मजा़क काफी नहीं था जनता पर बीस सूत्र और और उड़ेल दिये गये। हमेशा की तरह सत्ता के आसपास बौद्धिक अभिसार का खेल शुरू हुआ। किसी ने बहुत सोच कर कहा ‘इंदिरा इज इंडिया‘ । किसी बड़े अखबार के संपादक ने बुके के साथ प्रधानमंत्री को बधाई दी कि और यह विश्वास दिलाया कि अभी इंडिया के लोग इस लायक नहीं हुए कि उन्हें हर तरह की आज़ादी दी जाये। वंशीलाल, विद्याशरण शुक्ल, सिद्धार्थ शंकर रे ऐसे लोगों में थे जिन्होंने प्रेस पर नकेल कसने का काम किया। कानून के जरिये ‘आपत्तिजनक‘ सामग्री के प्रकाशन पर रोक लगायी और ‘आपत्तिजनक‘ को बड़े ही भ्रमपूर्ण तरीके से पारिभाषित किया। आमतौर इसका मतलब यही था कि शुक्ल जो ‘आपत्तिजनक‘ समझें वह आपत्तिजनक, वंशीलाल जो आपत्तिजनक समझें वह आपत्तिजनक। यानि आपत्तिजनक करार देने का ठेका इन्हीं को मिला।वी जी वर्गीज जो कभी इंदिरा गांधी के प्रेस सचिव रह चुके थे फिर से जब हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक हुए तो उनकी संपादकीय टिप्पणियां सरकार को नागवार लगने लगीं। हिंदुस्तान टाइम्स के मालिक के.के.बिड़ला को कहा गया कि हटाइए वर्गीज को। मामला प्रेस कांउसिल के पास गया। उन्होंने वैसा नहीं किया जैसा सरकार चाहती थी तो प्रेस कांउसिल को दिसंबर 1975 में भंग कर दिया गया। यह कहते हुए कि किसी काम का नहीं है प्रेस काउंसिल । बड़े अखबार स्टेट्समैन और इंडियन एक्सप्रेस दो ऐसे समूह थे जिनकी बिजली काटी गयी। उन पर प्री-सेंसरशिप थोपा गया। सेंसर करने वाले सरकारी हुक्काम हुआ करते थे। वे अखबार का हर पेज सेंसर करते और कभी-कभी उसे 8 बजे सुबह वापस करते जब संस्करण का समय निकल चुका होता। अधिकारी, सेंसर करने के बाद बच गयी जगहों में बीस सूत्री के किसी सूत्र/सूत्रों को पिड़ोने की नेक सलाह दिया करते थे। रामनाथ गोयनका ने खून पसीने से इंडियन एक्सप्रेस के कई संस्करण खड़े किये थे। उन्हें तंग करने की तो इंतहा ही हो गयी। पुरानी फाइलें खंगाल कर केस पर केस उन पर लादे गये। पत्रकारों में कुलदीप नैयर को बंद किया गया। पर कोर्ट ने उन्हें छोड़ने का आदेश दिया। इंडियन एक्सप्रेस की संयुक्त प्रसार संख्या जो लगभग 10 लाख तक हो गयी थी वह घट कर 90,000 हो गयी थी। सरकार ने पीटीआई, यूएनआई, हिन्दुस्तान समाचार और समाचार भारती सबको निरस्त कर एक एजेंसी समाचार का गठन किया। दूरदर्शन, आकाशवाणी के समाचार केवल सरकार प्रायोजित खबरों का ढोल पीटा करते थे। ज्यादातर समाचार पत्र चूंकि किसी तरह का जोखिम नहीं चाहते थे इसलिए समाचार की ही खबरें छापा करते थे। अखबार एक जैसी सरकार प्रायोजित खबरें प्रकाशित करने का नीरस जरिया बन गये थे। इसलिए उनकी प्रसार संख्या भी घट रही थी । जेपी सहित सभी विपक्षी नेता जेल भेज दिये गये थे। सरकार विरोधी खबरों का प्रसारण/प्रकाशन का एकमात्र जरिया भूमिगत गतिविधियां थीं। भूमिगत प्रकाशन कई शुरू हुए थे जिससे यदुनाथ थत्ते, दुर्गा भागवत, मृणाल गोरे जैसी शख्सीयतें जुड़ी हुई थीं। फर्नांडीज 1976 में पकड़े जा सके पर तब तक बेंगलूर में उनके परिजनों पर असहनीय जुल्म ढाया गया।
संजय गांधी की चौकड़ी, खासकर विद्याचरण शक्ला की हुक्मउदूली के कारण किशोर कुमार के गाये गीतों का प्रसारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से बंद कर दिया गया।
जेपी की जेल डायरी के अंश एवरीमैंस में प्रकाशित हुआ करते थे। वे लोगों को उत्साहित किया करते थे कि जेल में मिले समय का सदुपयोग करें-आपस में बातचीत करें। देश की वर्तमान स्थिति पर चर्चा करें। राजनीतिक बंदियों ने ऐसा किया भी। यह देश में एक अज़ीबोग़रीब दौर था जिसमें सुकून भरी चर्चा के लिए बाहर की अपेक्षा जेलें ज्यादा महफूज जगहें बन गयी थीं। बंदियों को पढ़ने के लिए बड़े अखबारों में मात्र टाइम्स ऑफ इंडिया उपलब्ध कराया जाता था। कांग्रेसी नेता इससे भी पेरशान थे कि संपादक, संपादकीय की जगहें खाली छोड़ दिया करते थे। तब सरकार पेरशान ही नहीं होती थी एकदम से बिफर पड़ती थी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वाई बी चव्हान ने एक सभा में चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अखबारों में खाली जगह छोड़ना भी सरकार का विरोध ही समझा जाएगा।
प्रधानमंत्री को ट्रांसपिरेसी इंटनरेशनल और दूसरी नागरिक स्वायतत्ता बहाली की पक्षधर संस्थाओं का दबाव झेलने में परेशानी होने लगी।
बच निकलने वाले दूसरे नेताओं में सुब्रह्मणयन स्वामी भी थे। स्वामी ने विदेशों में इमरजेंसी की मुखालफत और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए समर्थन जुटाने के लिए कई देशों के दौरे किये और एक अनुमान के अनुसार एक सौ से ज्यादा रेडियो और टीवी साक्षात्कार दिये। संजय गांधी पीएम की बुलायी बैठकों में नमूदार होने लगे थे और धीरे-धीरे यह नमूदारी जरूरत में बदलने लगी थी और गाहेबगाहे वे अफसरों को फरमान भी सुनाने लगे थे। संजय गांधी इमर्जेंसी के आकाश में उदित ऐसे नक्षत्र थे जिनपर तरह-तरह की महानता थोपने की होड़ कांग्रेसियों में लगी रहती थी। इंदिरा जी ने भी इनका शुभागमन बताते एक सभा में उन्हें यूथ कांग्रेस की अगुवाई सौंपी। यूथ कांग्रेस में उनकी लेफ्टिनेंट लेफ्टिनेंट अंबिका सोनी थीं। हालांकि ‘इंदिरा इज इंडिया’ के अनुभवी देवकांत बरूआ ने कहा कि संजय गांधी को यूथ कांग्रेस की अगुवाई सौंपना उन्हें दोधारी तलवार सौंपने जैसा था। तुर्कमान गेट कांड से लेकर मशहूर दुकानों से ‘यूथों’ की जबरन चंदा वसूली ने इस बात को सही साबित किया। इसी चरण में रूख़साना की शानदार इंट्री हुई थी जिससे लेफ्टिनेंट थोड़ी नाराज़ भी हुई थीं। तब राजस्थान से कांग्रेस के सांसद अमृत नाहटा ने एक फिल्म बना डाली। किस्सा कुर्सी का; आज के बच्चों की भाषा में कहें तो केकेके या ट्रिपल के; फिल्म में शबाना आजमी थीं।इससे पहले शबाना की फकीरा को विद्याचरण शुक्ला बेवजह लटका चुके थे। केकेके फिल्म में एक संवाद था ‘सर इसे छोटी कार बनाने का लाइसेंस दे दिया जाये क्योंकि यह मां के पेट से ही सीख कर आया है।’यह सीधे-सीधे संजय ब्रिगेड को चुनौती थी। ब्रिगेड ने सेंसर बोर्ड के कार्यालय से मास्टर प्रिंट सहित सभी प्रिंट उठाये और उन्हें गुड़गांव के मारूति प्लान्ट में ला कर फूंक दिया। बाद में प्रदर्शन के लिए कोई कापी नहीं बची । नाहटा ने इसे दोबारा केटी मिर्जा को लेकर बनाया था। इससे पहले नाहटा ‘संत ज्ञानेश्वर’ नाम की फिल्म बना चुके थे। अमृत नाहटा इसके बाद कांग्रेस से कभी नहीं लड़े।
इंमरजेंसी कुल जमा डेढ़ साल रही। लेकिन बीच में जैसे यह न खत्म होने वाली भयावह स्याह रात में तब्दील होती जा रही थी और सबेरे की आस एक चिढ़ाने और अवसादग्रस्त करने वाली आस लगने लगी। जेपी ने अपनी जेल डायरी के अंश में लिखा था ‘मेरे चारों ओर (मेरा घर) तहस-नहस हो गया है। इस ज़िंदगी को दुरूस्त कर पाऊंगा, अब यह शायद ही संभव लगता है। भाषण में भी लगभग यही निराशा झलकी जब उन्होंने कहा कि ‘सुरंग के अंतिम छोर पर मुझे अब दूर-दूर तक कोई रोशनी नहीं दिखायी देती।’
पटना, इमरजेंसी के दिनों में राष्ट्रीय छायाकारों और पत्रकारों के रिपोर्टिंग का जरूरी हिस्सा बन गया था। छायाकार रघुराय भी पटना आये थे और उन्होंने एक तस्वीर खींची थी। यह तस्वीर रघुराय की पारखी नज़र, समय को न पहचानने की भूल और परिणामस्वरूप कच़डे के डब्बे में भविष्य तलाशने की नियति का अच्छा उदाहरण है।

