विजय भास्कर
मौत के मुंह से निकल आने जैसे मुहावरे की उत्पत्ति के बारे में भाषाविद् शायद बेहतर तरीके से बता सकते हैं, पर वैज्ञानिकों के पास भी ऐसे काफी आंकड़े हैं, जो वैसी दुनिया के बारे में बताते हैं, जो मौत के बाद नसीब होती है। नियर डेथ एक्सपीरिएंस (एनडीई) या निकट मृत्यु अनुभव बताने वालों को एनडीयर्स कहा जाता है। ऐसे कई एनडीयर्स ने ऐसी चैंकाने वाली बातें बताई हैं, जो एक पारलौकिक दुनिया का संकेत देती हैं। विज्ञान और टेक्नोलॉजी की दुनिया अब पहले से ज्यादा उदार हो गई है और परामनोविज्ञान, पारलौकिक दुनिया, पुनर्जन्म, आत्मा, परकाया प्रवेश जैसी बातों को आज के वैज्ञानिक सुनते भी हैं और गुनते भी हैं। किसी भी घटना को अवैज्ञानिक कहकर उसे किनारे कर देना एक तरह का वैज्ञानिक कट्टरवाद है। कट्टरवाद चाहे जहां भी हो, वह अविश्वास और अनिश्चय का माहौल बनाने में मदद करता है। इसलिए वैज्ञानिक ऐसी बातों को सुनकर कोशिश करते हैं कि उसे किस तरह वैज्ञानिक रूप से परिभाषित किया जाए या किन वैज्ञानिक आधारों पर उसे नकार दिया जाए। सुनने में यह कहानी लगती है, लेकिन इसका प्रकाशित विवरण चैंकाता है। एक व्यक्ति बिल्कुल अचेत अवस्था में वाशिंगटन के एक अस्पताल लाया गया। डॉक्टरों ने उसे कृत्रिम सांस देने की प्रक्रिया शुरू की। इसी बीच एक नर्स ने देखा कि वह व्यक्ति नकली दांत लगाए हुए है। नर्स ने नकली दांत निकाल दिए। फिर एक ट्यूब मुंह से होते हुए गले तक उतारा गया। व्यक्ति को गहन चिकित्सा इकाई में ले जाया गया। वहां उसका इलाज हुआ और वह चंगा भी हो गया। एक हफ्ता बीतने पर जब वह अस्पताल आया तो उसने उस नर्स को तुरंत पहचान लिया, जिसने उसके कृत्रिम दांत निकाले थे। नर्स बेचारी चकित रह गई, क्योंकि वह व्यक्ति तब गहरे कोमा में था, जब उसे अस्पताल लाया गया था, पर उस व्यक्ति ने सारा वर्णन कुछ इस तरह सुनाया जैसे वह प्रत्यक्ष सब कुछ देख चुका हो। उसने नर्स को बताया कि वह सब कुछ ऊपर से देख रहा था, उसे अस्पताल के जिस बेड पर रखा गया था उससे वह ऊपर उठकर ‘अपने’ साथ होता हुआ सब कुछ देख रहा था। एक मनोरंजक गल्प कथा, बिल्कुल किसी सांध्य दैनिक में प्रकाशित हो सकने वाली सनसनीखेज-सी खबर जैसी। इस व्यक्ति से संबंधित यह विवरण ब्रिटेन के मेडिकल कर्नल लैंसेट में प्रकाशित हुआ है। लैसेंट पूरी दुनिया में मानक मेडिकल जर्नल है। इसमें चिकित्सा जगत के सर्वश्रेष्ठ शोधों और आलेखों को अंकवार समेटा जाता है। लैसेंट का यह विवरण अमेरिकी अखबारों ने प्रमुखता से छापा।
निकट मृत्यु अनुभव अब तक सामान्य गतिविधियों में नहीं आया था- विज्ञान इसे ‘अछूत’ सा मानता था। नया अध्ययन हालैंड के वैज्ञानिकों के हवाले से प्रकाशित हुआ है। उन्होंने थोड़ा नयापन लाते हुए नए ढंग से इस विषय को प्रस्तुत किया है। अब तक ऐसे लोगों के अनुभव को ही रेकॉर्ड किया गया था, जो मौत के मुंह से लौट आए थे। इनका साक्षात्कार लेने के बदले इन वैज्ञानिकों ने वैसे लोगों से साक्षात्कार लेना शुरू किया, जिनकी हृदय गति रुकने के कारण क्लिनिकल मृत्यु हो गई थी। इनमें से 18 प्रतिशत मरीजों ने क्लिनिकल मृत्यु की अवधि में क्या कुछ हुआ, उसे बता दिया। 18 से 12 प्रतिशत ने निकट मृत्यु अनुभव सुनाए।
लैसेंट में प्रकाशित अनुसंधान पत्र में वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस बात के अब पर्याप्त साक्ष्य हैं कि निकट मृत्यु अनुभव का अस्तित्व है। आलेख में वैज्ञानिकों से अनुरोध किया गया है कि वे इस आत्यंतिक चिकित्सा रहस्य-मानव चेतना की प्रकृति और स्वरूप के सिद्धांतों के बारे में फिर से विचार करें। अनुसंधान पत्र के मुख्य वैज्ञानिक, हृदय रोग विशेषज्ञ पिप वैन लोमेल ने कहा कि यह नज़रिया अनुसंधान करने वालों को बदलना होगा कि चेतना की जड़ें केवल कोशिकाओं और अणुओं तक ही सीमित हैं।
इस आलेख के साथ ही एनोमैलिस्टिक साइकोलॉजी रिसर्च यूनिट के निदेशक क्रिस्टोफर फ्रेंच का भी आलेख शामिल किया गया है। इस आलेख में क्रिस्टोफर फ्रेंच ने कहा है कि एक बार साक्षात्कार रेकॉर्ड करने के बाद फॉलो अप के लिए जब दोबारा एनडीयर्स का साक्षात्कार लिया गया, तब उनमें से कई लोगों ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई इंटरव्यू नहीं दिया था। इसके उलट कुछ लोगों ने बाद में बताया कि उन्हें कई अनुभव हुए, जबकि पहले दौर में ऐसा कोई अनुभव होने से उन्होंने इनकार कर दिया था। डॉ. फ्रेंच का यह आलेख पूरक आलेख के रूप में ही है। मुख्य आलेख डच वैज्ञानिकों का ही है। डा. फ्रेंच का कहना है कि यह उलट फेर असत्य याददाश्त या फाल्स मेमोरी के कारण हो सकता है।

निकट मृत्यु पर किया जाने वाला यह पहला शोध नहीं है। इसके पहले भी इस विषय पर काफी शोध हुए है। इनमें अग्रणी रहे हैं डॉ. रेमंड ए. मूडी। डॉ. रेमंड ने 26 साल पहले निकट मृत्यु प्रक्रिया के बारे में एक पुस्तक लिखी थी लाइफ ऑफ्टर लाइफ और स्वाभाविक रूप से विज्ञान जगत में इसकी जमकर आलोचना भी हुई थी। लगभग 12 साल बाद डॉ. रेमंड ने अपने एक सहयोगी लेखक पेरी के साथ न्यू एज जर्नल में अपनी कई आलोचनाओं का उत्तर दिया। डॉ. रेमंड ने जवाब वाले आलेख में ये रोचक पंक्तियां लिखी हैं। क्या होता है, जब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है ? शायद मानव प्रजाति के लिए सबसे उलझाने वाला सवाल है। क्या हम अचानक इस दुनिया में अपना अस्तित्व त्याग देते हैं और रह जाती है केवल भौतिक काया, जो इस धरती पर हमारे रहने के साक्ष्य के रूप में होती है। क्या इस मौत के बाद हमें दोबारा तभी जिंदगी मिलती है, जब हमारे खाते में नेक काम ही मौजूद हों ? या फिर हम किसी जंतु के रूप में जन्म लेते हैं जैसा कि हिन्दू शास्त्रों में वर्णन है या फिर हमारा जन्म पीढि़यों बाद होता है और यह सब करने-धरने वाली क्या कोई परा शक्ति है।
डा. रेमंड का कहना है कि इन मूलभूत सवालों से हम आज भी उतनी ही दूर हैं, जितना आज से हजार वर्ष पहले थे। लेकिन इस बीच साधारण और अतिसाधारण लोगों ने ऐसे निकट मृत्यु अनुभव सुनाए हैं कि इस रहस्यमय और पारलौकिक दुनिया की एक पूरी झलक मिलती है और ऐसा लगता है कि हमने कुछ सफर तो किया ही है। कैसी है यह दुनिया ?
डा. रेमंड का कहना है कि लाइफ आफ्टर लाइफ पुस्तक के बाद मैं कई तीखी आलोचनाओं का जवाब नहीं दे पाया था। सवाल काफी तीखे थे। जैसे मेरे अध्ययन को क्यों वैज्ञानिक या प्रामाणिक माना जाए। कई डॉक्टरों ने यह दावा किया कि उनके लंबे चिकित्सा अनुभव में ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिसे निकट मृत्यु या नियर डेथ एक्सीपीरियंस (एनडीई) कहा जा सके। कई डॉक्टरों का दावा था कि यह स्क्रिजोफ्रेनिया या उस जैसी बीमारी के कारण हो सकता है। कुछ का कहना था कि यह अनुभव अति धार्मिक या पवित्र लोगों को ही होता है। कुछ का कहना था कि यह मेडिकल पेशे को राक्षसी प्रवृत्ति की ओर मोड़ने की कोशिश है। किसी बच्चे को ऐसा अनुभव क्यों नहीं हुआ- केवल इसलिए कि वे वयस्कों के मुकाबले सांस्कृतिक रूप से कम प्रदूषित थे ? कुछ ने कहा कि ये अनुभव संख्यात्मक रूप से इतने कम हैं कि कम से कम किसी वैज्ञानिक सिद्धांत का प्रतिपादन तो इससे नहीं ही किया जा सकता। बहरहाल ये सब आलोचनाएं डॉ. रेमंड को ज्यादा हतोत्साहित नहीं कर पाईं। वे दोगुने जोश से फिर शोध में जुट गए, लेकिन इस बार ज्यादा लोगों ने इस विषय को शोध के लायक समझा, डॉ. रेमंड अब कई सवालों का उत्तर देने में सक्षम हैं। उनका कहना है कि कई लोग यह समझ भी नहीं पाते कि मृत्यु या निकट मृत्यु अनुभव में कोई अंतसंबंध भी है। मृत्यु से उसका कुछ लेना देना भी है। इस अनुभव में व्यक्ति अपनी भौतिक काया से निकल कर उसे देख पाने में सक्षम होता है। अपने को इस तरह से देखना बहुत कुछ श्वसन प्रक्रिया के दौरान साक्ष्य भाव से अपने शरीर को देखने जैसा होता है, पर एक बड़ा अंतर यह होता है कि एनडीई अनुभव के दौरान व्यक्ति भ्रम-भय की स्थिति में होता है और कभी-कभी उसे अपनी भौतिक काया की शिनाख्त में भी दिक्कत होती है।
एक व्यक्ति ने बताया कि अपने शरीर से निकलने के बाद उसने अपने को आर्मी अस्पताल के एक वार्ड में पाया, वहां उस जैसे कई युवक उसी की उम्र और कद-काठी के थे। वास्तव में वह सारे शरीरों को इसलिए देखते हुए गुजर रहा था कि उसका अपना शरीर कौन सा है यह उसे पता चले। एक व्यक्ति भीषण दुर्घटना में अपनी दोनों बाहें खो चुका था। उसने बताया कि अपने शरीर से निकलकर वह ऑपरेशन टेबल के आस-पास चक्कर लगाते हुए ऑपरेशन किए जाने वाले व्यक्ति पर तरस खा रहा था। बाद में उसे पता चला कि ऑपरेशन किया जाने वाला वह शरीर उसी का है। अपनी भौतिक काया की शिनाख्त ऐसा बिंदु है, जहां पर एनडीयर्स को भय और भ्रम होता है, पर बाद में उन्हें सही स्थिति का आभास हो जाता है कि उनके शरीर के साथ क्या कुछ किया जा रहा है। डॉ. रेमंड ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि वे लोग, जिन्हें मेडिकल शब्दावली का थोड़ा भी अहसास नहीं होता वे भी डॉक्टरों की आपसी बातचीत समझ लेते हैं। कई बार वे आसपास के लोगों से कुछ कहते हैं, लेकिन मौजूद लोगों में से कोई भी उनकी बात नहीं सुन पाता। कई बार वे लोगों को अपने हाथ से छूने की कोशिश करते हैं, पर वह हाथ लोगों के शरीर से ऐसे गुजर जाता है मानो उनका हाथ बिल्कुल शून्य का बना हो, बिना उनके शरीरों को छुए वह आर-पार हो गया।
एक घटना तो डा. रेमंड की एक महिला मरीज के साथ हुई। महिला की हृदय गति रुकने के बाद डॉ. रेमंड ने उन्हें सीपीआर देना शुरू किया । बाद में उस महिला ने उन क्षणों को याद करते हुए बताया कि मसाज के समय ही शरीर से निकल कर वह अशरीरी हो गई और बेड पर पड़े अपने शरीर को देखती रही। वह सब करने से रोकने की कोशिश करती रही, जो वह अपनी मरीज को जिंदा करने के लिए कर रहे थे। उसे लग रहा था, वह बिल्कुल ही ठीक-ठाक है। डॉ. रेमंड खामख़ा ही हलकान हुए जा रहे हैं। डॉक्टर रेमंड ने कुछ नहीं सुना, लेकिन जब उसकी नसों में इंजेक्शन देने लगे तो उसने उनका हाथ पकड़ कर रोकने की पूरी कोशिश की। काश वह पकड़ पाती। उसका हाथ बिल्कुल डॉक्टर रेमंड के हाथ से आर-पार हो गया।
आखिर अशरीरी क्यों चाहते हैं कि उनकी काया के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जाए ? एक स्वाभाविक सा प्रश्न! इस अशरीरी स्थिति में होने के बाद एक महिला ने बताया कि तब मैं अपने पति की पत्नी नहीं थी, अपने बच्चों की गार्जियन नहीं थी, न ही अपने गार्जियन की बच्ची। तब मैं केवल मैं थी। एक महिला ने बताया कि उस समय ऐसा लग रहा था, जैसे कोई बैलून धागे से काट दिया गया हो और ठीक इसी बिंदु पर सारा भय और भ्रम हर्ष में बदल जाता है। एक असीम शांति का अहसास होता है। जब तक मरीज अपने दैहिक शरीर में रहता है, उसे असह्य वेदना होती है, पर जैसे ही रिबन कटता है यह पीड़ा, शांति और वेदना रहित होती है। वास्तविक शांति का अहसास होता है। डॉक्टर रेमंड ने कई हृदय रोगियों से बातचीत करने पर पाया कि उनकी असह्य वेदना और दुश्चिंताएं अशरीरी अवस्था में आह्लाद के क्षणों में बदल गईं। कई अनुसंधान करने वालों ने बताया है कि जब भी मस्तिष्क को असह्य वेदना अनुभव होती है, मस्तिष्क से ऐसे रसायनों का स्राव होता है, जिससे वेदना की अनुभूति रुक जाती है। अभी तक ऐसे प्रयोग नहीं किए, जिससे यह पता चले कि वास्तव में सह सिद्धांत सही ही है। अशरीरी (अनुभव) आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरिएंस (ओबीई) कैसा होता है, इसके बारे
में अनुभवी कोई बहुत ठोस उत्तर नहीं दे पाए, जिससे सही-सही यह पता चले कि अशरीरी किस तरह के होते हैं। कुछ लोगों ने इसे कई रंगों की घटनाओं वाले बादल की तरह कहा। कुछ ने बताया कि जब वह इस अशरीरी अवस्था में थे, तो उन्होंने अपना हाथ देखा- लगा कि पूरा हाथ प्रकाश से बना है और उसमें कई छोटी-छोटी कणिकाएं बनी हुई हैं। अंगुलियों की छाप की तरह कई चक्र बने हुए थे और वहां से प्रकाश का एक ट्यूब जैसा ऊपर की बांह तक पहुंचता था।
एक बार थोड़ा रुक कर हम यहां सोचें कि लाइट एट दि एंड ऑफ ए टनल जैसा मुहावरा हमारे प्रयोग में कहां से आया। गेंद एक बार फिर भाषाविदों के पाले में।
डा. रेमंड और उनके एंडीयर्स के अनुसार रिबन के कटने या अशरीरी अनुभव (ओबीई) से गुजरने के बाद लोगों को लगता है कि वास्तव में इन सब अनुभवों का मौत से कुछ लेना-देना है। इस बिंदु पर पहुंचने के समय वे अपने को अकस्मात एक सुरंग के प्रवेश द्वार पर पाते हैं। फिर उन्हें लगता है कि एकबारगी उन्हें अंधेरी सुरंग में ढकेल दिया गया हो। इस गहरी सुरंग से गुजरते हुए उन्हें अंत में प्रकाशपुंज दिखाई देता है। कैंसर से जूझते एक बच्चे की मां ने बताया कि अपने अंतिम समय में उसके बच्चों ने छल्लेदार सीढ़ियों से होते हुए ऊपर जाने की बात कही थी। कई को सुरंग में प्रवेश करते समय एक ध्वनि सुनाई पड़ती है। किसी को विद्युत तरंगों या गुनगुनाने की आवाज सुनाई पड़ती है। 15वीं शताब्दी की एक पेंटिंग मिली है। एफ बाउश की इस पेंटिंग का शीर्षक है ‘स्वर्गिक आरोहण’। इस पेंटिंग में एक आभामंडल वाले मसीहा को मरते लोगों को ध्यान ऊपर की ओर आकर्षित करते हुए दिखाया गया है। कुछ को अंधेरी सुरंग से गुजरकर प्रकाशपुंज की दुनिया में आते और वहां आकर श्रद्धाभाव से झुकते दिखाया गया है।
कई एनडीयर के अनुभव के बाद यह स्पष्ट होता है। इन सबमें एक उभयनिष्ट बात जरूर है। ये सारे किसी रास्ते से गुजरते हुए अंत में प्रकाशपुंज तक पहुंचते हैं।
कार्ल सैगॉन खासे चर्चित खगोलविद और लेखक थे। उन्होंने कहा था कि सुरंग की अवधारणा के पीछे बहुत संभव है, मानव के जन्म की प्रक्रिया हो। मां की कोख से जन्म लेते समय शिशु को संघर्ष करते हुए एक उजास दुनिया में आंखें खोलनी पड़ती हैं। अगर सैगॉन की इस व्याख्या को एनडीयर की व्याख्या के साथ जोड़ा जाए तो कहीं न कहीं जन्म और मृत्यु क्या एक नहीं हो जाते ? कार्ल सैगॉन ने अपनी मशहूर पुस्तक ब्रोकाज ब्रेन: रिफलेक्शन ऑन दि रोमांस ऑफ साइंसेज में लिखा है कि बिना किसी अपवाद के एक विकल्प है- जहां तक मैं देख सकता हूं, हर व्यक्ति ने ऐसा अनुभव किया, मानो वह मौत की धरती से लौट आया। उसे उड़ान में सनसनी हुई, वह अंधेरी दुनिया से पूर्ण प्रकाशपुंज दुनिया में आ गया। प्रकाश में नहाने जैसा अनुभव। यह उभयनिष्ट अनुभव लौकिक दुनिया की केवल एक ही प्रक्रिया से मिलता है, वह है जन्म की प्रक्रिया। कार्ल बेकर, दर्शनशास्त्र के जाने-माने प्रोफेसर हैं। उन्होंने इसके लिए अनुसंधान किया कि शिशुओं को अपने जन्म की कितनी बातें याद रहती हैं या कुछ भी याद नहीं रहतीं। बेकर का निष्कर्ष है कि नवजात शिशु अपने जन्म की कोई बात नहीं याद रख पाते। उनके मस्तिष्क में ऐसी कोई फैकल्टी नहीं होती, जिसमें ऐसी यादें सुरक्षित रखी जा सकें। उनके सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई कि नवजात शिशु आंकड़े में फर्क नहीं कर पाते।
एक समाज विज्ञानी ने निकट मृत्यु अनुभव बयान करने वालों से बातचीत के आधार पर जानकारी लेने की कोशिश की कि आखिर उनमें निकट मृत्यु अनुभव से पूर्व और अनुभव के पश्चात् क्या अंतर आ जाता है। उस समाज विज्ञानी को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि निकट मृत्यु का अनुभव करने वाले ज्यादातर लोग प्यार और स्नेह के महत्व को समझ गए थे। सबने आनंद की इंतिहां महसूस की थी और नैतिक मूल्यों का महत्व समझ गए थे। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे पूरा विश्व एक है। सब लोग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। उन्होंने इस अवधारणा की सटीक व्याख्या करने में थोड़ी कठिनाई का अनुभव किया, पर अपने भीतर उन्होंने परिवर्तन जरूर महसूस किया। इस परिवर्तन के कारण वे प्रकृति से स्नेह करने लगे। अपने आस-पास के परिवेश और वातावरण से स्नेह करने लगे। डॉ. रेमंड ने एक उद्योगपति के अनुभवों का विवरण दिया है। यह उद्योगपति बिजनेस की बात के अलावा कुछ सोचते ही नहीं थे। इन्हें हृदय गति रुकरने के कारण अस्पताल आना पड़ा था। उन्होंने बताया कि ‘पहली बार जब मुझे होश आया तो मैंने फूल देखे। आप विश्वास कीजिए या नहीं मृत्यु से वापस आने से पहले कभी मुझे फूल देखने का समय ही नहीं मिला था। मृत्यु के बाद एक चीज जो मैंने सीखी कि हम सब एक जीवित और विशाल ब्रह्मांड के ही अंग हैं। अगर हम यह सोचते हैं कि हम अपने को बिना हानि पहुंचाए किसी दूसरे व्यक्ति या किसी दूसरे जीवित वस्तु को हानि पहुंचाने में सफल रहेंगे, तो यह हमारी सबसे बड़ी गलतफहमी है। कई अनुभवी तो लौटने के बाद ‘ज्ञान’ के दीवाने होकर लौटे। कई का कहना था यह जीवन की उनकी समीक्षा का ही परिणाम था कि बेहतर इंसान बनने का मौका उन्हें मिला। कुछ प्रकाश के बने अशरीरी ने कहा कि सीखना तुम्हारी मृत्यु के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। सीखा हुआ तुम यहां भी लेकर आ सकते हो (बशर्ते तुमने कुछ सीखा हो) । कुछ ने बताया कि जीवन के बाद जीवन की यह निहायत ही दूसरी दुनिया थी, जो लगता है ज्ञान पिपाशा की शांति के लिए ही निर्मित थी।
एक महिला ने विशालकाय ब्रह्मांड के रूप में इस दुनिया का वर्णन किया, जहां लोग आस-पास के वातावरण के बारे में गंभीर चर्चा में व्यस्त थे। एक ने इसे चेतना की ऐसी स्थिति बताई, जहां आपकी चाही हर चीज उपलब्ध है। अगर आपको लगता है कि कुछ विषयों के बारे में आपको जानकारी चाहिए तो यहां जैसे जानकारी का पूरा खजाना उपलब्ध है। इस तरह के अनुभवों ने प्रत्यक्ष तौर पर कई लोगों का जीवन परिवर्तित कर दिया। शरीर से निकल अशरीरी होकर चाहे जितने भी कम क्षण के लिए वे उस अवस्था में रहे हों-ज्ञान के द्वार उनके खुल गए और उनकी ज्ञान पिपासा भी बढ़ गई। कुछ ने नए कैरियर तलाशे- कुछ ने गंभीर अध्ययन शुरू कर दिए। ज्यादातर ने जिम्मेदारी महसूस कर अपनी जिंदगी के रास्ते तय करना शुरू किया और तात्कालिक और दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करने के बाद ही किसी काम को करने या न करने का फैसला लेना उन्होंने शुरू कर दिया। कई ने यह महसूस किया कि जिंदगी वास्तव में दो दिनों की है, इसीलिए यह बड़ी कीमती है और इसे भरपूर तरीके से जीना चाहिए। ऐसा अनुभव करने वाले अनेक लोग धार्मिक प्रवृत्ति के हो गए- लेकिन इतने भी नहीं कि किसी स्थानीय चर्च के अंग हो जाते! वास्तव में उन्होंने उन धार्मिक सिद्धांतों को परे करना शुरू किया, जो अब तक उन्हें बताया जाता रहा था। सेमिनरी में पढ़ने वाले एक एनडीयर ने बताया ‘वहां जाकर मुझे लगा कि इन धर्मशास्त्रों में उलझने वाला मैं वास्तव में कितना मूरख था और वह लोग इस पर अचरज करेंगे अगर मैं उन्हें यह बताऊं कि ईश्वर की रुचि किसी धर्मशास्त्र में नहीं है। वे (प्रभु) मेरे दिमाग के बारे में बिल्कुल ही जिज्ञासु नहीं थे। उन्हें इससे मतलब था कि मेरे दिल में क्या है। गहरी सुरंग के अनुभव को कई वैज्ञानिकों ने रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने का प्रतिफल कहा है। सांस रुकने के साथ चूंकि कार्बन डाइऑक्साइड बाहर नहीं निकलता है इसलिए उन क्षणों के दौरान इस गैस की मात्रा काफी बढ़ जाती है। डॉ. रेमंड ने लिखा है वैसे इस पर काफी कुछ परीक्षण हुए हैं और हृदय रोग विशेषज्ञ माइकल सेबांग का शोध नहीं होता, तो शायद मैं यह स्वीकार कर लेता कि सुरंग का अनुभव कार्बन डाइऑक्साइड से जुड़ा हुआ हो सकता है। डॉ. सेबांग ने अपने कई एनडीई मरीजों के रक्त के ऑक्सीजन स्तर की माप इस दौरान की और लगातार उन्हें रक्त में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ा हुआ मिला।
ये सारे अनुभव मतिभ्रम के कारण भी हो सकते हैं, ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। कई मामलों में इलेक्ट्रो इनसेफालोग्राम ऐसी स्थिति में बिल्कुल सपाट या फ्लैट आए हैं। सपाट या फ्लैट संकेतों को आसानी से मस्तिष्क की मौत माना जा सकता है। बल्कि मौत की फिलहाल वैधानिक व्याख्या भी यही है, लेकिन सपाट इइजी संकेत वालों ने भी निकट मृत्यु अनुभव किया है। भारतीय योग पद्धति में मन मस्तिष्क को विचारों से खाली करना या निर्विचारिता वर्षों से कठिन अभ्यास रहा है। इसमें लोगों को शिक्षित किया जाता है। बौद्ध भिक्षुओं को सिखाए जाने वाले सामरिक कौशल में (मार्शल आर्ट्स) में भी सिखाया जाता है कि सामने दुश्मन से संघर्ष करते हुए अपने मस्तिष्क को विचार शून्य कर लेना जरूरी है और इसे किस तरह किया जाए। अगर आप जीत का अतिविश्वास दिमाग में रख लें तो आपको पछताना पड़ सकता है। हार की मानसिकता बनाने पर तो हार की संभावना यूं ही ज्यादा बन जाती है।
बहरहाल, एक बार अगर हम यह सोचें कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय-से वास्तव में कबीर का क्या आशय था! यहां आकर चुनरी मलिन होने का पछतावा या फिर ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया का आह्लाद उन्हें क्यों था। वैसे डॉ. रेमंड का कहना है कि अब यदि मुझसे पूछा जाए कि इस जीवन के बाद भी क्या कोई जीवन है तो मैं बिल्कुल ‘हां’ कहूंगा।
